Rashtriya Khel Ki Durdasha (in Hindi) - Online Article

Image01

ये किसी की विडंबना ही कही जायेगी कि अपने राष्ट्रीय खेल कि दुर्दशा देख रहे हो। ये तभी हो सकता है जब वह किसी के अधीन हो लेकिन हमारा देश तो स्वतन्त्र है। लगभग सवा अरब की आबादी ११ खेलने वाले भी नही। ये तो हद ही है, लेकिन इसके लिये जिम्मेदार कौन है?हम जो अपने बच्चों को पैदा होते ही किकेट का बैट दे देते है कि बेटा धोनी बन जा या किसी दूर स्कूल में दाखिला करा देते है कि वो बड़ा हो कर इन्जीनियर या डाक्टर बन जाये या उन नेताओं को कोसे जिन्होने खेल का राजनीतिकरण कर डाला। ये तो वैसे ही है कि जैसे कोई अपने देश से ही गद्दारी कर रहा हो। इसके जिम्मेदार हॉकी फेडरेशन में बैठे वो अधिकारी भी है जिनके अधकचरी सोच ने भारतीय हॉकी को नरक का वो गोता लगवाया कि उसको उबरने में ही इतना वक्त लग जाये कि वो हमारे देश से ही समाप्त हो जाये।

वैसे किसी वस्तु का पतन उसी दिन शुरु हो जाता है जब वो अपनी सर्वोच्चता पर होता है। १९७२ में हमारा देश जब हॉकी में ओलंपिक जीतने का जश्न मना रहा था उसी समय १९७६ में मांट्रियल ओलंपिक में उसकी हार की कथा बुनी जा रही थी। वैसे हॉकी की ताबूत में कील गड़ना उसी दिन शुरू हो गया था लेकिन आखिरी कील जाकर अब ठुकी है। वैसे भारत जैसे देश में दो वस्तु बहुत आसानी से मिलती है एक नशे की वस्तु दूसरे दोषारोपण करने वाले लोग।

Image2

वो दूसरे लोग हम ही है जो इसकी जिम्मेदारी कभी नेताओं को देते है तो कभी के.पी.एस. गिल को। गिल साहब के बारे में क्या कहे वो तो बेहया और बेशर्म की ऐसी मूर्ति है जिनको आत्मसम्मान आज तक छू न सका है। लेकिन हम लोग भी कम नहीं है। देश में कितने ऐसे लोग है जो हमारी राष्ट्रीय के ११ खिलाडियों का नाम जानते होंगे? शायद २ या ३ %। झाकिए अपने गिरेहबान मे जिस पर इतनी स्वार्थ भ्रष्टाचार, कुटिलता की धूल जम चुकी है, जिसको देख पाना नामुमकिन हो गया है।

समझिए अपने आप को, जिसे आपने क्रिकेट की चुधिंयाते प्रकाश में खो दिया है। कम से कम हमारे अधकचरे नौजवानों और बूढ़े प्रौढ़ौ को तो ये सोचना ही चाहिए जो केवल कि आत्मा को यही गुमटी होटल और रेस्तराँओ में बैठ कर दोषारोपण करना ही जानते है पर हम भी इसके पीछे कही न कही जिम्मेदार है। सब जानते है इसके पीछे हॉकी फेडेरेशन, ओलम्पिक सन्घ ही वास्तविक जिम्मेदार है जिनकी अदूरदर्शिता सन्कुचित विचारो ने खेल का ही मटियामेट कर डाला है। लेकिन परोक्ष रूप में हम कही न कही इसके दोषी है। जब तक हम इस गलती को स्वीकार करके,स्वीकार न ही बल्कि प्रायश्चित कर ले तब तक धिक्कार है हमारे जीने पर । क्योकिं मेजर ध्यानचन्द को ये सच्ची श्रद्धान्जलि होगी।

About the Author:

No further information.




Comments

No comment yet. Be the first to post a comment.